मार्च 25, 2026 8:17 अपराह्न

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने संशोधित उड़ान योजना को 10 वर्षों के लिए 28,840 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूरी दी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजना – संशोधित उड़ान योजना को वर्ष 2026-27 से वर्ष 2035-36 तक दस वर्षों की अवधि के लिए मंजूरी दे दी है। इस पर 28 हजार आठ सौ 40 करोड़ रुपये की लागत आएगी।

नई दिल्ली में आज मंत्रिमंडल की बैठक के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के लिए मौजूदा अप्रयुक्‍त हवाई पट्टियों को सौ हवाई अड्डों में विकसित किया जाएगा। इससे कम सेवा वाले और अनुपलब्ध क्षेत्रों में क्षेत्रीय हवाई कनेक्टिविटी में सुधार होगा।

इससे दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों में आर्थिक विकास, व्यापार और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और आम नागरिकों के लिए किफायती हवाई यात्रा को सुगम बनाया जा सकेगा। इससे दूरस्थ और पहाड़ी क्षेत्रों में आपातकालीन प्रतिक्रिया और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में सुधार होगा और क्षेत्रीय हवाई अड्डों और एयरलाइन ऑपरेटरों के लिए अधिक व्यवहार्यता और स्थिरता सुनिश्चित होगी।

कैबिनेट ने आव्रजन, वीजा, विदेशी पंजीकरण और ट्रैकिंग-आई.वी.एफ.आर.टी योजना को 31 मार्च, 2026 के बाद पांच साल की अवधि के लिए पहली अप्रैल, 2026 से 31 मार्च, 2031 तक, 18 सौ करोड़ रुपये के बजट परिव्यय के साथ जारी रखने की मंजूरी दे दी है।

आई.वी.एफ.आर.टी प्लेटफॉर्म का उद्देश्य भारत में आव्रजन, वीजा जारी करने और विदेशियों के पंजीकरण से संबंधित कार्यों को आपस में जोड़ना और उन्हें सुव्यवस्थित करना है। आई.वी.एफ.आर.टी का मुख्य उद्देश्य एक सुरक्षित और एकीकृत सेवा वितरण ढांचे के भीतर आव्रजन और वीजा सेवाओं का आधुनिकीकरण और उन्नयन करना है।

इसका उद्देश्य वैध यात्रियों को सुविधा प्रदान करना और साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है। इस परियोजना को आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति द्वारा 13 मई 2010 को एक हजार 11 करोड़ रुपये के बजट परिव्यय और सितंबर 2014 तक की परियोजना अवधि के साथ अनुमोदित किया गया था।

मंत्रिमंडल ने वर्ष 2031 से 2035 की अवधि के लिए भारत के राष्ट्रीय निर्धारित योगदान को भी मंजूरी दे दी है, जिससे संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा संधि और पेरिस समझौते के तहत देश की महत्वाकांक्षा को बढ़ावा मिला है।

साथ ही सतत विकास और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से निपटने की न्‍यायसंगत जिम्‍मेदारी के प्रति उसके संकल्‍प को बल मिला है। भारत ने 2005 के स्तर से 2035 तक अपने सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता को 47 प्रतिशत तक कम करने का संकल्प लिया है।

फरवरी 2026 तक देश ने 52 दशमलव पांच-सात प्रतिशत गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता हासिल कर ली है। इससे निर्धारित समय सीमा से पांच साल पहले ही लक्ष्य को सफलतापूर्वक हासिल कर लिया गया है। अब 2035 तक स्थापित विद्युत क्षमता में गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा संसाधनों की हिस्सेदारी को 60 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

2031-35 के लिए भारत का राष्‍ट्रीय निर्धारित योगदान विकसित भारत की परिकल्पना से प्रेरित है जो न केवल 2047 का लक्ष्य है बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध और जलवायु परिवर्तन के प्रति मजबूत भारत बनाने के लिए आज ही कार्रवाई करने की प्रतिबद्धता है।