मार्च 25, 2026 8:26 अपराह्न

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संसद में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों का संरक्षण संशोधन विधेयक 2026 पारित

संसद ने ट्रांसजेंडर व्यक्ति-अधिकारों का संरक्षण, संशोधन विधेयक, 2026,  पारित कर दिया है। राज्यसभा ने आज विधेयक को मंजूरी दे दी। लोकसभा इसे पहले ही ध्वनि मत से पारित कर चुकी है। विधेयक में ट्रांसजेंडर की श्रेणी को फिर से परिभाषित करने, स्व-अनुभूत लैंगिक पहचान के प्रावधान को हटाने और कई सामाजिक-सांस्कृतिक पहचानों के साथ ट्रांसमैस्कुलिन व्यक्तियों को इसके दायरे से बाहर करने का प्रयास किया गया है।

    राज्यसभा में विधेयक पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार ने कहा कि सरकार ट्रांसजेंडर समुदाय के कल्याण के प्रति सहानुभूति रखती है। उन्होंने कहा कि विधेयक में ट्रांसजेंडरों को सशक्त बनाने और उन्हें सम्मान दिलाने के प्रावधान हैं। उन्‍होंने कहा कि एनडीए सरकार ने ट्रांसजेंडरों को मुख्यधारा में लाने और उनके खिलाफ भेदभाव को रोकने के लिए कई पहल की हैं।

    यह विधेयक अंतर-लिंगीय भिन्नताओं और यौन विकास में अंतर के आधार पर ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को जैविक ढांचे के भीतर परिभाषित करता है। उच्च सदन में चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने कहा कि यह विधेयक संविधान के तहत प्रदत्त व्यक्ति की निजता को कमजोर करता है। विधेयक का विरोध करते हुए श्रीमती रेणुका चौधरी ने कहा कि नौकरशाही प्रमाणन के माध्यम से स्व-पहचान को छीना नहीं जा सकता। सरकार की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि प्रस्तावित विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों और गरिमा को कमज़ोर करता है।

    इस कदम को गलत और गैरकानूनी बताते हुए उन्होंने तर्क दिया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को आधिकारिक प्रमाण पत्रों के माध्यम से अपनी पहचान साबित करने के लिए मजबूर करना संविधान द्वारा प्रदत्त समानता और गरिमा के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

    श्रीमती चौधरी ने कहा कि प्रस्तावित विधेयक उस फैसले में निर्धारित सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और पहले से स्थापित कानूनी ढांचे का सम्मान नहीं करता है। डीएमके सांसद तिरुचि शिव ने भी विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि यदि ट्रांसजेंडर व्यक्ति विधेयक संसद में बहुमत से पारित भी हो जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय इसे रद्द कर देगा। उन्होंने कहा कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन करता है, जो इस समुदाय को स्वतंत्रता, गरिमा और आत्मनिर्णय के अधिकार से वंचित करता है। इस विधेयक का समर्थन करते हुए भाजपा सांसद मेधा विश्राम कुलकर्णी ने कहा कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए न्याय, सम्मान, अपराधीकरण से सुरक्षा और कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह विधेयक लाया गया है।

    उन्होंने इस विधेयक में कुछ संशोधन करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद भी दिया, ताकि इसका लाभ योग्य लोगों तक सही तरीके से पहुंच सके। उन्होंने कहा कि एक ऐसे कानून की आवश्यकता है जो वास्तविक ट्रांसजेंडरों को न्याय दिलाए और नकली ट्रांसजेंडरों को दंडित करे। श्रीमती कुलकर्णी ने कहा कि जन्म से ट्रांसजेंडर लोगों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि सजा बढ़ाने वाले संशोधन से अपराध और जबरन पहचान के मामलों में कमी आएगी।

    टीएमसी के साकेत गोखले ने कहा कि भारत में 31 प्रतिशत ट्रांसजेंडर लोगों ने भेदभाव के कारण आत्महत्या का प्रयास किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि अब सरकार उनके साथ भेदभाव शुरू करने जा रही है, मानो सामाजिक भेदभाव काफी नहीं था। उन्होंने इसे अस्वीकार्य बताया। श्री गोखले ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लिंग का निर्धारण मुख्य चिकित्सा अधिकारी और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाएगा और विधेयक में इस मुख्य चिकित्सा अधिकारी के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं की गई है।

    आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा कि यह विधेयक ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए एक बड़ा झटका है। उन्होंने सरकार पर समुदाय के लिए कुछ भी न करने का आरोप लगाया। आरजेडी के मनोज कुमार झा ने कहा कि ट्रांसजेंडरों के प्रति पूर्वाग्रह समाप्त होने चाहिए और उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि लिंग का आत्मनिर्णय छीना नहीं जाना चाहिए।

    सीपीआई (एम) के जॉन ब्रिटास ने कहा कि यह एक काला दिन है और यह विधेयक भारत को एक सदी पीछे ले जा रहा है। उन्होंने सरकार से विधेयक वापस लेने या इसे एक चयन समिति को भेजने की अपील की। ​​समाजवादी पार्टी की जया बच्चन ने भी इस कानून को लेकर सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने विधेयक की गहन और सावधानीपूर्वक जांच किए बिना ही यह जानने की कोशिश की कि इसे लाने की इतनी जल्दी क्या है। इस पर चर्चा जारी है।