फ़रवरी 19, 2026 2:10 अपराह्न

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सर्वोच्च न्यायालय ने कहा-मुफ्त योजनाओं की संस्कृति आर्थिक विकास में बाधा डालती है, राज्यों से रोजगार सृजित करने का आह्वान

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मुफ्त रेवड़ियों की संस्कृति से देश के आर्थिक विकास में बाधा आ रही है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉय माल्या बागची तथा न्यायमूर्ति विपुल एम पंचौली की पीठ ने कहा कि देश के अधिकांश राज्य राजस्व घाटे में हैं, फिर भी विकास की अनदेखी करते हुए वे इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं। न्यायालय ने तमिलनाडु विद्युत वितरण निगम लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही। याचिका में कहा गया है कि उपभोक्ताओं की आर्थिक स्थिति पर ध्यान दिए बिना सभी को मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव किया गया था।
 
पीठ ने कहा कि राज्यों को मुफ्त भोजन, साइकिल और बिजली देने के बजाय रोजगार सृजन पर काम करना चाहिए। इसमें कहा गया कि राज्य विकास परियोजनाओं पर खर्च करने के बजाय दो काम करते हैं -वेतन देना और इस तरह की फिजूलखर्ची करना। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि इस तरह से मुफ्त की योजनाएं शुरू करने से कोई कार्य करना नहीं चाहेगा फिर कार्य संस्कृति का क्या होगा?
 
तमिलनाडु में डीएमके सरकार के नेतृत्व वाली विद्युत वितरण कंपनी द्वारा मुफ्त बिजली देने के प्रस्ताव पर सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और अन्य को नोटिस जारी किया है। कंपनी ने विद्युत संशोधन नियम, 2024 के एक नियम को चुनौती दी है। पीठ ने पूछा कि विद्युत शुल्क अधिसूचित होने के बाद तमिलनाडु की कंपनी ने अचानक मुफ्त बिजली देने का निर्णय क्यों किया?
 
पीठ ने कहा कि कल्याणकारी उपायों के अतंर्गत राज्य सरकारों का भुगतान करने में असमर्थ लोगों को मुफ्त बिजली देना समझ में आता हैं लेकिन समर्थ और असमर्थ लोगों के बीच अंतर किए बिना बिजली वितरण समझ नहीं आता हैं। पीठ ने सवाल उठाया कि क्या यह तुष्टीकरण की नीति नहीं होगी?