सर्वोच्च न्यायालय ने आज पारिस्थितिकी रूप से समृद्ध लगभग 31 हजार चार सौ 68 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले सारंडा वन को वन्यजीव अभ्यारण्य के रूप में अधिसूचित करने का निर्देश झारखंड सरकार को दिया। न्यायालय का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपने रवैये में बार-बार परिवर्तन करने के बाद राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारी से भाग नहीं सकती है।
देश के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के नेतृत्व वाली पीठ ने कड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य सरकार ने कैसे एक साल से अधिक समय तक ढुलमुल रवैया अपनाया। अदालत ने कहा कि पहले राज्य सरकार ने स्वीकार किया था कि सारंडा खेल अभ्यारण्य के पूरे क्षेत्र को 1968 में पहली बार अधिसूचित किया गया था। यह कोई सक्रिय खनन क्षेत्र नहीं था और उसे संरक्षण की आवश्यकता थी।
एक छोटे संरक्षित क्षेत्र को अधिसूचित करने संबंधी झारखंड सरकार के प्रयास का खंडन करते हुए पीठ ने कहा कि राज्य को अब वन्यजीव अभ्यारण्य के क्षेत्र को घटाकर लगभग 24 हजार नौ सौ 42 हेक्टेयर करने के अपने रवैये में बदलाव करने का कोई कारण नहीं दिखता है।
आदेश में कहा गया है कि राज्य सरकार द्वारा पहले के आदेशों की स्पष्ट अवमानना पाये जाने के बाद अदालत ने मुख्य सचिव को भी समन भेजा है। न्यायालय का कहना है कि भारतीय वन्यजीव संस्थान ने व्यापक पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और भू-आकृति विज्ञान महत्व के तौर पर इस क्षेत्र को वर्णित किया है।