गुजरात के प्रथम ज्योतिर्लिंग पर आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व एक आध्यात्मिक संगम ही नहीं बल्कि भारत के प्राचीन वैज्ञानिक ज्ञान का भी उत्सव है। जनवरी 1026 में पहले आक्रमण के एक हज़ार वर्षों के बावजूद सोमनाथ मंदिर का अस्तित्व भारत की अदम्य भावना का प्रतीक है।
यह पर्व विनाश के स्मरण के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र की अटूट श्रद्धा और सांस्कृतिक संकल्प को प्रदर्शित करने के लिए आयोजि किया गया है। सदियों से, आक्रमणकारियों ने सोमनाथ को बार-बार निशाना बनाया। हालांकि, हर बार देवी अहिल्या बाई होल्कर जैसे भक्तों के सामूहिक संकल्प से मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ। पुनरुद्धार के इस अटूट चक्र ने सोमनाथ को भारतीय सभ्यता की शाश्वतता का सशक्त प्रतीक बना दिया है।
स्वतंत्रता के बाद 11 मई 1951 को पुनर्निमित वर्तमान सोमनाथ मंदिर को भक्तों के लिए पुनः खोले जाने के पचहत्तर वर्ष भी पूरे हो रहे हैं।