सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर रोक लगा दी है। ये एफआईआर हाल में कोलकाता स्थित राजनीतिक परामर्श फर्म आई-पीएसी के परिसर और उसके सह-संस्थापक प्रतीक जैन के आवास पर की गई तलाशी के संबंध में दर्ज की गई थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि याचिकाओं में, केंद्रीय जांच में राज्य एजेंसियों के कथित हस्तक्षेप के गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और विपुल पंचोली की पीठ ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार, कोलकाता पुलिस आयुक्त और अन्य को प्रवर्तन निदेशालय की उन याचिकाओं पर नोटिस जारी किया है, जिनमें पिछले सप्ताह चलाए गए तलाशी अभियान के दौरान बाधा डालने का आरोप लगाया गया था। पीठ ने प्रतिवादियों को अपने जवाबी हलफनामे दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है । मामले की आगे सुनवाई के लिए अगले महीने की 3 तारीख तय की गई है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में, अगली सुनवाई की तारीख तक तलाशी परिसर और आसपास के क्षेत्रों की सीसीटीवी फुटेज और अन्य रिकॉर्डिंग वाले उपकरणों को सुरक्षित रखने का भी निर्देश दिया है। न्यायालय ने कानून के शासन का पालन करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा है कि यदि ऐसे मुद्दों को अनसुलझा छोड़ दिया जाए, तो इससे अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। प्रवर्तन निदेशालय ने तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए दावा किया है कि आई-पीएसी के कार्यालय और प्रतीक जैन के आवास पर एक साथ चलाए गए तलाशी अभियानों के दौरान उसके अधिकारियों को प्रतिरोध का सामना करना पड़ा और उन्हें कानून के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करने से रोका गया। निदेशालय ने यह भी आरोप लगाया है कि पश्चिम बंगाल के अधिकारियों के हस्तक्षेप से उसकी जांच की निष्पक्षता प्रभावित हुई है।
प्रवर्तन निदेशालय ने एक नए आवेदन में, पुलिस महानिदेशक सहित पश्चिम बंगाल पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। इसमें आरोप लगाया गया है कि उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ मिलकर जांच में बाधा डाली और कथित तौर पर सबूतों को हटाने में मदद की। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात की भी जांच करने पर सहमति जताई कि क्या किसी राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियां किसी गंभीर अपराध की केंद्रीय एजेंसी की जांच में हस्तक्षेप कर सकती हैं। प्रवर्तन निदेशालय की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि अतीत में भी, जब भी वैधानिक प्राधिकरणों ने वैधानिक शक्ति का प्रयोग किया, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने कहा कि यह एक बेहद चौंकाने वाला पैटर्न दर्शाता है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने तुषार मेहता के तर्कों का विरोध करते हुए कहा कि यह कहना सरासर झूठ है कि सभी डिजिटल उपकरण जब्त कर लिए गए थे।