March 18, 2024 5:43 PM

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Parikrama

नमस्‍कार। समाचार पत्रिका परिक्रमा में आपका स्‍वागत है हम आपके लिए लेकर आते हैं- देश विदेश के समाचार। साथ ही देशभर में मौजूद हमारे संवाददाता अपनी विशेष रिपोर्ट के माध्‍यम से आपको अलग-अलग राज्‍यों की नवीनतम गतिविधियों की जानकारी देते हैं। आर्थिक जगत की खबरों पर भी हमारी नजर रहती है।

 

We still have  a week for the festival of HOLI …but if we talk about the Holi in BRAJ …”It  is the most famous Holi which is celebrated for 10 days. The people who belong to Vrindavan, Mathura and Gokul celebrate this with great joy and enthusiasiasm as there is a reason behind celebrating the Holi festival in these cities because itis associated with Lord Krishna, who is supposed to have grown up here…

 

It is avibrant celebration featuring various customs like Lathmar Holi, Phoolon kiHoli, Widow’s Holi, and Raas-Leela, honoring Lord Krishna.

 

There is a Laddu Holi celebrated in Barsanawhere women playfully hurl laddoos at men, which represents the playful teasingof Lord Krishna by the gopis.Barsana’s Lathmar Holi represents the thrashing of Lord Krishna with sticks byRadha and Gopis after he smeared them with colour.The festival attracts globaltravelers and culminates in colorful events at various temples.If you can takeout some time ….please do make a visit to this region which is the most vibrantone during this festival of colours.Starting today’s episode of Parikramawe will first give you all, the newsheadlines at this hour.

 

THE HEADLINES::

⦁ Three day Startup Mahakumbh begins at Bharat Mandapam in New Delhi; Aims to connect startups with inventors including venture capitalists, investors and potential corporate partners. 

⦁ वरिष्‍ठ भाजपा नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना के जगतियाल में चुनावी रैली की।

⦁ Supreme Court rejects Delhi Ex Minister Satyendar Jain’s bail in a money laundering case; Asks him to surrender immediately.

⦁ व्लादिमीर पुतिन ने रिकॉर्ड पांचवीं बार रूस के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीता।

⦁ And met Department forecast rain and snowfall in Jammu and Kashmir, Ladakh, Himachal Pradesh and Uttarakhand.

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And listeners, now time for our segment DATELINE INDIA in which we take a look at the developments taking place at national or global level. Today we will talk about the STARTUP MAHAKUMBH

 

तीन दिवसीय स्‍टार्टअप महाकुंभ आज से नई दिल्ली के भारत मंडपम में शुरु हो गया है। यह कार्यक्रम 20 मार्च तक चलेगा। इस आयोजन में विभिन्न स्‍टार्टअप के अलग-अलग पवेलियन बनाए गए हैं, इनमें एआई, एग्रीटेक, डीपटेक, क्‍लाईमेट टेक, गेमिंग, ई-स्‍पोर्ट्स, फिनटेक जैसे अनेक विशेष पवेलियन शामिल हैं। इस महाकुंभ का उद्देश्य पूंजीपतियों और निवेशकों को भारतीय व्‍यापार के साथ जोड़ना है।

 

The government aims to improve India’s global ranking in terms of innovation, and hopes the Startup Mahakumbh will provide a boost in this regard. Startup Mahakumbh is expected to attract thousands of startups and investors across ten key focus areas – artificial intelligence and software-as-a-service, agritech, business-to-business and manufacturing, biotech and pharmaceuticals, climate tech, deeptech, direct-to-consumer, gaming and esports, fintech, and incubators and accelerators.

 

उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग के सचिव राजेश कुमार सिंह ने कहा कि भारत तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप तंत्र का देश है और नए स्टार्टअप की इस सूची में प्रतिदिन बड़ी संख्या में वृद्धि हो रही है। इस स्‍टार्टअप महाकुंभ में दो हजार से अधिक स्‍टार्टअप, हजारों निवेशक, 30 हजार भावी उद्यमी और विश्‍वस्‍तरीय प्रतिनिधि मंडल भाग ले रहे हैं।

 

The event will also host top women leaders to highlight their pivotal role within the startup ecosystem. “At ‘Startup Mahakumbh’, we are not just showcasing startups; we are enabling an ecosystem where women lead with resilience and creativity, driving forward the global narrative of Indian entrepreneurship. So we can say that this mega event is a major step towards promoting indian small business holders.

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अब समय हो गया है कि अपने संवाददाताओं के माध्‍यम से देश के अलग-अलग भागों में होने वाली खबरों से अवगत कराने का।

 

UP

होली का त्यौहार करीब आ रहा है। देश में अन्य जगहों पर होली भले ही 25 या 26 तारीख को मनायी जाये लेकिन ब्रज में तो रंगोत्सव शुरू हो चुका है और आज लठमार होली खेली जा रही है

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मथुरा में होली का उत्सव 45 दिन तक चलता है। और देश ही नहीं विदेशों से भी श्रद्धालु होली का यहाँ आनंद ले रहे है  श्रद्वालु अबीर गुलाल से सराबोर है। आज यहां लठमार होली मनाई जा रही है, जिसके लिए सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किये गये हैं। मथुरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) शैलेश कुमार पांडेय ने बताया कि बरसाना को छह जोन, 15 सेक्टरों में बांटकर चप्पे-चप्पे पर पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है।

 

उन्होंने बताया कि बम निरोधक दस्ते, अग्निशमन दस्ते, श्वान दस्ते व सादी वर्दी में खुफिया पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है। मथुरा में स्थित राधा जी के गांव बरसाना स्थित श्रीजी मंदिर परिसर में लड्डू होली के साथ रंगोत्सव-जगह-जगह चल रहा है ।  पर्यटन विभाग, उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद, जिला प्रशासन ने जगह जगह स्वागत द्वार बनाए गए हैं। मुख्य आयोजन राधा बिहारी इंटर कॉलेज में हो रहा है जहां पर कलाकार मस्ती भरे गीत एवं रसिया प्रस्तुत कर रहे हैं और श्रद्वालु भरपूर आनंद ले रहे है।

 

आज विश्व प्रसिद्ध बरसाना की लट्ठमार होली बड़े ही उत्साह और उमंग के साथ खेली जा रही है .राधारानी रुपी गोपियों ने नंदगाँव के  हुरियारों पर जमकर लाठियां बरसाईं.

 

मान्यता है कि बरसाने की महिलाओं की लाठी जिसके सिर पर छू जाए, वो सौभाग्यशाली माना जाता है। होली पर परंपरा, आस्था और भक्ति के रंग में पूरा ब्रज डूबा हुआ है।

 

यूं तो होली पूर देश में खेली जाती है लेकिन ब्रज की होली का विशेष महत्व होता है। देश-विदेश के अलग-अलग हिस्सों में जहां रंग, गुलाल और पानी से होली खेली जाती है। वहीं ब्रज में रंग-गुलाल के अलावा लट्ठमार, छड़ीमार, लड्डू और फूलों वाली होली मनाई जाती है। ब्रज की होली में लट्ठमार होली सबसे खास होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापरयुग में भगवान कृष्ण ने राधा रानी और गोपियों के साथ लट्ठमार होली खेली थी। इसके बाद से ही यहां लट्ठमार होली खेलने की परंपरा शुरू हुई। ब्रज में होली को होरा कहा जाता है।

परिक्रमा के लिए मथुरा से मुहम्मद उमर कुरैशी के साथ सुशील चंद्र तिवारी

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KURSEONG

दार्जिलिंग पहाड़ में फूल की खेती तथा फूल उत्पादन से स्थानीय लोगों की बढती आय़।

 

फूल प्रकृतिका वह अनमोल उपहार है जो मन्दिर से लेकर घर तक की शोभा बढाता है। विश्व के जितने भी मत पन्थ या धार्मिक स्थल होंगे अथवा शादी विवाह, अन्य उत्सव, सरकारी व राजनीतिक समारोह अथवा मंच हैं उन सबकी शोभा फूलों ही बढती है। देश विदेश में फूलों की मांग वर्ष भर रहती है।

 

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हिमालय की गोद में बसा पश्चिम बंगालका सून्दर रमणिय पहाड़ी क्षेत्र दार्जिलिंग का प्रकृतिक सौंदर्य बसन्त ऋतू में फूलों से और भी मन मोहक हो जाता है तथा पर्यटकों को बहुत आकर्षित करता है।। इस पहाड़ी क्षेत्र के गावों का शायद ही कोई ऐसा घर होगा जिसके आंगन में विभिन्न प्रजाति के फूल घर की शोभ न बढाते हों।

 

गत कूछ वर्षों से दार्जिलिंग पार्वतीय क्षेत्र में फूलों की खेती करनेवाले किसानों की संख्या बढी है। फूलों की खेती से उनका आय भी बढ़ रहा है। राज्य व केन्द्र सरकार के संबंधित कृषि विभाग भी फूलों की खेती को संवर्धित करने तथा किसानों को आधुनिक तकनीक व बजार उपलब्ध करानें में हर सम्भव मदद कर रहे हैं। बागवानी से संबंधित यहाँ की कई गैर सरकारी संस्थाएं भी फूल की खेती, उत्पादन व फूल ब्यापारको संवर्धित करने हेतु विशेष रूप से जनवरीस फरवरी व मार्च के महिने में जगह-जगह बड़े स्तर पर पूष्प प्रदर्शनी का आयोजन करती हैं। मार्च के शुरू में यहाँ के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मिरिक में हिमालयन पूष्प प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस पष्प प्रदर्शनी में करीब 50 से अधिक प्रजाति के फूलों को प्रदर्शित किया गया। यहाँ के फूल विशेष कर अर्किड व ग्लैडियस विश्व प्रसिद्ध है। अर्किड के ही 10 से अधिक प्रजातियाँ हैं। इस के अलावा एजिलिया, जरबेरिया, हेमनतास, पपिटियस, हेलिकोनिया,

एसट्रोबेरिया, कारमिशन, फ्रिजिया, रिबन क्यक्टस, केन्ना आदि भी यहाँ के प्रसिद्द फूलों में सूमार हैं। इनके अलावा चाँप, गुरांस, लाली, गोदावरी, घण्टी फूलों का स्थान भी उल्लेखनीय है।

 

हिमालयन हर्टिकल्चर सोसाइटीद्वारा मार्च महिने के प्रथम सप्ताह में कर्सियांग में एक बड़ा पूष्प प्रदर्शनी का आयोजन आयोजित किया गया। वैसे भी कर्सियांग को अर्किड की भूमि के नाम से जाना जाता है। तीन दिन तक चले इस प्रदर्शनी में कोलकात, दिल्ली व मूम्बई के पूष्प ब्यापारियो की सह भागिता रही। इसी क्रम में पश्चिम बंगाल सरकार के बागवानी विभाग व यहाँ के फूल खेती संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में गत जनवरी के अन्त में कालिम्पोंग में एक बड़ा पूष्प प्रदर्शनी का आयोजन किया गया, जिस में बढी संख्या में कृषक, फूल विक्रेता व पर्यटक सामिल रहे।

 

सिलीगुडी के कंचन जंगा स्टेडियम में 40वाँ वार्षिक उत्तर वंगाल फूष्प प्रदर्शनी का आयोजन सिलिगुड़ी हर्टिकल्चर सोसोइटीद्वारा किया गया। इस में 90 से अधिक स्टल लगाए गए थे, जहाँ विभिन्न प्रजाति के फूलों को प्रदर्शित किया गया था। आज उत्तर बंगाल बागवानी तथा पूष्प उद्यान के गढ़ के रूप में तेजी से विकसित हो रहा है, जिस में दार्जिलिंग हिमालयी क्षेत्रका बड़ा योगदान है। परिक्रमा हेतु अशोक चौरसिया,

आकाशवाणी कर्सियांग।

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For the first time in Ladakh, the Higher Education Department  has introduced  Skill courses  in different colleges of the region.

 

It is being imparted in collaboration with the Six Sector of Skills Councils, University of Ladakh and Ladakh Skills Development Mission. Our Leh correspondent Yangchan Dolma has filed more on this.

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To develop a better skilling ecosystem in Ladakh, the Higher Education Department has made an intervention in it through its initiative: Education and Skill Forge with partnership. Under this banner, 10 different skill courses are being  imparted to the students since  2023 from August -September 1st  Semester.  For these courses , 15 skills Centres have already been set up in 5 Colleges Campus. 

 

These  courses are  being provided to the students as part of the curriculum of the college and based on credit system. Since it is made as certified courses, the enrollment of the students has been made encouraging  with 600 hundred students in the first semester availing the courses. Introduction of skills courses in the colleges have started with the signing of Memorandum of understanding between University of Ladakh, Six Sectors Skills Councils and Ladakh Skills Development Mission on 10th of December in 2022.  To strengthen the Skill Centre college, Ladakh Skills Development Develop Mission has four skill Workshop Cum Laboratories at Elizier Joldan Memorial College in Leh City. This college is providing courses in Mushroom Culture, High Altitude Trekking Guide , Graphic Designer and Food Processing. Other colleges which are located in other Sub Division of Ladakh , also offering services to the youth who are not enrolled in the college.

Yangchan Dolma for Parikrama from Leh Ladakh.

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मेघालय के प्रसिद्ध स्ट्रॉबेरी फल की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य का परिवहन, कृषि और किसान कल्याण विभाग साझा रूप से पांच से 13 अप्रैल के बीच स्ट्रॉबेरी महोत्सव का आयोजन करेगा।

 

मेघालय के प्रसिद्ध स्ट्रॉबेरी फल की खेती को प्रोत्साहन देने के लिए राज्य का परिवहन, कृषि और किसान कल्याण विभाग साझा रूप से स्ट्रॉबेरी महोत्सव का आयोजन करेगा। स्ट्रॉबेरी एक मीठा और रसीला फल है, जो अपने विशेष स्वाद के लिए प्रसिद्ध है।

 

कार्यक्रम के दौरान किसानों को स्ट्रॉबेरी की बागवानी के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। राज्य के बागवानी विभाग ने विभिन्न केंद्रीय और राज्य सरकार की योजनाओं के तहत स्ट्रॉबेरी के पौधे लगाए हैं। राज्य में स्ट्राबेरी की फसल रोपण का मौसम शुरू हो चुका है।

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Business news today:

 

Benchmark indices ended on a positive note today with Nifty above 22,050. The 30-share Sensex rose 105 points or 0.14 per cent to close at 72,748 and NSE Nifty jumped 32 points or 0.15 percent to finish at 22,056.

 

In the forex market, the Indian rupee today ended at 82 rupees and 91 paise against the US dollar.

 

In the global oil market intra-day trade, Brent Crude was trading at 86 dollars and 21 cents per barrel when reports last came in.

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खेल गतिविधियां::

In Cricket, Royal Challengers Bangalore have won the Women’s Premier League title beating Delhi Capitals by 8 wickets in New Delhi last night. Chasing a target of 114 runs set by Delhi, Bangalore comfortably scored 115 for 2 in 19.3 overs.

Earlier, deciding to bat first, Delhi Capitals were all out for 113 runs in 18.3 overs.

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अब समय है उन व्‍यक्‍तित्‍व को याद करने का जिनकी आज है पुण्‍यतिथि, जयंती या जन्‍मदिवस।

DEATH ANN………….

Rajkumari Dubey: (1924 – 2000)

A Melodious Maestro an iconic playback singer whose mesmerizing vocals and extraordinary contributions continue to resonate in the hearts of music enthusiasts.

Rajkumari Dubey

Born in 1924 in British India, Rajkumari’s musical journey defied all odds, captivating audiences with her natural talent and unmatched passion. From a tender age, Rajkumari displayed an innate gift for singing, despite never receiving formal training in the art.

 

Encouraged by her supportive family, she fearlessly pursued her dreams, leaving an indelible mark on the Indian music industry. At the remarkable age of 10, Rajkumari recorded her first song for the esteemed music recording house HMV in 1934.

 

This auspicious beginning propelled her into the spotlight as a stage artist, where her enthralling voice and emotive performances left audiences spellbound. The prodigious talent of Rajkumari soon caught the attention of Vijay Bhatt and Shankar Bhatt, influential figures from Prakash Pictures.

 

Recognizing her immense potential, she was offered a dual role as an actress and singer in their production company. Her debut film, ‘Sansar Leela Nayi Duniya,’ marked the beginning of her cinematic journey, followed by noteworthy roles in other movies.

 

Later …Parting ways with Prakash Pictures, she embarked on a successful voyage as a playback singer, lending her enchanting voice to actresses like Ratnamala and Shobhana Samarth. Notably, she holds the esteemed distinction of being the “First Female Playback Singer of Indian Cinema.” Her versatility knew no bounds, as she effortlessly recorded numerous songs in Gujarati and Punjabi, showcasing her linguistic prowess.

 

Despite her lack of formal training, Rajkumari possessed a rare ability to adapt to various musical styles. Her mastery of classical forms such as thumri and dadra showcased her impeccable skills as a classical singer.

 

Alongside renowned contemporaries like Shamshad Begum, Zohrabai Ambalewali, Juthika Roy, and Zeenat Begum, Rajkumari mesmerized audiences with her captivating performances. A notable collaboration was her duet with the illustrious Noor Jehan in the film “Naukar” released in 1943, leaving an everlasting impression on music enthusiasts.

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पुण्‍यतिथि

शास्त्रीय संगीत की प्रसिद्ध गायिका सिद्धेश्वरी देवी का आज निधन हुआ था। उन्हें ठुमरी गायन की साम्राज्ञी कहा जाता था।

 

छोटी सी उम्र में ही उन्होंने अपने माता पिता को खो दिय लेकिन संगीत के प्रति रूझान ने उनके लिए रास्ते भी बनाए और उन्हें मंजिल तक भी पहुंचाया। एक बार मुम्बई में एक संगीत सम्मलेन में जिसमें उस्ताद बड़े गुलाम अली खान और फैयाज़ खां ने भी शिरकत की। सिद्धेश्वरी देवी ने उसमें ठुमरी प्रस्तुत की जिसके बोल थे-काहे को डारे रे गुलाल ब्रजलाल कन्हाई और उसके बाद आफताब ए मौसिकी फैयाज़ खान ने गाने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि इस प्रस्तुति, इस संगीत के बाद अब और किसी के लिए कोई जगह नहीं हैं।

 

सिद्धेश्वरी देवी को अपने जीवन काल बहुत-से पुरस्कार एवं सम्मान मिले हैं, जो इस प्रकार है पद्मश्री पुरस्कार (1966)·   साहित्य कला परिषद सम्मान (उत्तर प्रदेश)

 

संगीत नाटक अकादमी सम्मान

उनकी पुत्री सविता देवी भी प्रख्यात गायिका हैं। उन्होंने अपनी मां की स्मृति में ‘सिद्धेश्वरी देवी एकेडेमी ऑफ़ म्यूजिक’ की स्थापना की है।

 

जाने-माने निर्देंशक मणि कौल ने सिद्धेष्वरी देवी पर एक वृत्त  बनाया था और उसे  सर्वश्रेष्ठ डाॅक्यूमेंटी का राष्टीय पुरस्कारर मिला था

 

सिद्धेश्वरी देवी ने एक बार कहा था कि उनकी सबसे बड़ी इच्ध्दा यही है  िक सही सुर-तान के साथ गाते हुए वो ये दुनिया छोडे ।

 

हिन्दी सिनेमा की जानीमानी गायिका राजकुमारी दुबे की आज पुण्‍यतिथि है। उनका नाम भले ही नई पीढ़ी के लिए विस्मृत हो चुका हो, लेकिन पुराने संगीत के चाहने वालों में उनका नाम आज भी उसी अदब के साथ लिया जाता है, जैसे उनके कार्यकाल में लिया जाता था। उनकी आवाज़ में एक अनोखी मिठास थी, जो भुलाए नहीं भूलती। वे अपने ज़माने की अग्रणी और बेहद प्रतिभाशाली गायिका रहीं। उनके गाए गानों ने बीस से भी अधिक वर्षों तक श्रोताओं का दिल लुभाया। गायिका राजकुमारी दुबे ने बेशुमार अभिनेत्रियों को आवाज़ प्रदान की। उन्होंने अनगिनत संगीतकारों, गीतकारों एवं रंगमंच के कलाकारों को सफलताएँ देने में अहम भूमिका निभाई थी।

 

कहते हैं कि एक बार राजकुमारी सार्वजनिक मंच पर गाना गा रही थीं। वहीं उनकी मुलाकात फ़िल्म निर्माता प्रकाश भट्ट से हो गई। उन्होंने राजकुमारी को ‘प्रकाश पिक्चर’ से जुड़ने का न्यौता दे दिया। इस बैनर के तहत बनने वाली गुजराती फ़िल्म ‘संसार लीला’ में कई गाने पेश किए। इस फ़िल्म को हिन्दी में भी ‘संसार’ नाम से फ़िल्माया गया। इसमें राजकुमारी जी ने गीत पेश किया ‘आंख गुलाबी जैसे मद की प्यालियां, जागी हुई आंखों में है शरम की लालियां।’ इसके बाद तो उनकी प्रतिभा बॉलीवुड में सिर चढ़कर बोलने लगी। वर्ष 1933 में फ़िल्म ‘आंख का तारा’, ‘भक्त और भगवान’, 1934 में ‘लाल चिट्ठी’, ‘मुंबई की रानी’ और ‘शमशरे अलम’ में गीत पेश कर राजकुमारी दुबे ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा दिया। इस दौरान उनके कई कालजयी गीतों ने लोगों को गुनगुनाने के लिए बाध्य कर दिया। अधिकतर सुनने वालों को याद नहीं होगा कि पार्श्वगायन से पहले राजकुमारी अभिनय से भी जुड़ी हुईं थीं।

 

‘बम्बई की सेठानी’ में अभिनय के साथ ही राजकुमारी ने “हमसे क्यों रूठ गये बंसी बजाने वाले” गीत भी गाया था। फिल्म ‘बाम्बे मेल’ के गीत उस ज़माने में बेहद मुकम्मल साबित हुए। गीत “किसकी आमद का यूँ इन्तज़ार है” राजकुमारी ने स्वयं लल्लूभाई एवं इस्माइल के साथ बहुर खूबसूरती के साथ गाया। इस गीत में आरकेस्ट्रा न के बराबर है, पर उनकी आवाज़ की मिठास सुनने वाले का ध्यान खींचती है। इसी फिल्म में धीमी गति की एक गज़ल “बातों बातों में दिल-ए-बेज़ार” उन्होंने अपनी मीठी तानों संग गाया था। फिल्म का “कागा रे जइयो पिया की गलियन” तो बहुत ही लोकप्रिय हुआ था। 1936 उनके लिए बहुत सफल साबित रहा। कुछ लोग गलत समझते हैं कि इस साल की लोकप्रिय फिल्म ‘देवदास’ में भी अभिनेत्री थीं, पर चन्द्रमुखी की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री भिन्न हैं। इनके बावरे नैन (1950) के गाने “सुन बैरी बालम सच बोल”, महल (1949) के गाने “घबराना के जो हम सर को टकरायन” और पाकीज़ा (1972) के गाने “नजरिया की मारी के कारण काफी जानी जाती हैं।

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प्रसिद्ध मराठी विद्वान् नारायण शास्त्री मराठे की भी आज पुण्‍यतिथि है। नारायण शास्त्री ने संस्कृत भाषा और धर्मशास्त्रों का अध्ययन करने के लिए गृह त्याग दिया।

 

नारायण शास्त्री ने अपने गुरु के नाम पर 1906 में ‘प्रज्ञा मठ’ नामक विद्यालय की स्थापना की। इसमें छात्रों को भारतीय दर्शन की शिक्षा देने की विशेष व्यवस्था थी। बाद में इस संस्था का नाम ‘प्रज्ञा पाठशाला’ हो गया। हिन्दू धर्म की विचारधारा का शोध कार्य करने के लिए उनके प्रयत्न से ‘धर्म निर्णय मंडल’ स्थापित किया गया। इसमें महामहोपाध्याय वामन काणे जैसे विद्वानों का भी सहयोग था। 1927 में उन्होंने प्रज्ञा पाठशाला के अंतर्गत ‘धर्मकोश कार्यालय’ का गठन किया। इस संस्था ने हिन्दुत्व के विविध अंगों से संबंधित सात खंडों का विशाल ग्रंथ प्रकाशित किया जो अपने क्षेत्र का विश्वकोश स्तरीय प्रकाशन माना जाता है।

 

SHASHI KAPOOR

Remembering ShashiKapoor on his birth anniversary. His contributions to Indian cinemacontinue to inspire generations.Theactor has done varied roles in his career span.Shashi Kapoor receivedcritical acclaim for his portrayal of a reckless chieftain in ‘Junoon’, abusinessman in ‘Kalyug’, a strict father in ‘Vijeta’ and an honest journalistin ‘New Delhi Times’ for which he won National Film Award for Best Actor.He was also honoredwith Padma Bhushan, in 2011. In 2014, Dadasaheb Phalke Award was conferred uponhim for his contribution to Indian cinema.Dialogue in ShashiKapoor’s voice followed by a song Ni sultana re…He began his career as achild actor in 1948 with his brother Raj Kapoor’s maiden directorial Aag,and had his first role as an adult in the year 1961 with Yash Chopra’s political drama Dharmputrab.But it were the  two blockbusters- Waqt and Jab Jab Phool Khile.[, which  established him in 1965. Rightly called India’s First InternationalStar as Shashi Kapoor was lead protagonist in 7English films and worked as a supporting actor/narrator in 5 English films…..whichwere box-office success  including TheHouseholder (1963), Shakespeare-Wallah (1965), and Heat and Dust (1983). HePlayed negative role in Peirce Brosnan starrer The Deceivers (1988).Shashi Kapoor wasalso a popular romantic hero of his time.

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मलयालम भाषा के कवि अक्किथम अछूथन नंबूथिरी का आज जन्‍मदिवस है। वह ‘अक्किथम’ नाम से अधिक लोकप्रिय थे। अक्किथम अछूथन नंबूथिरी को लेखन की एक सरल और आकर्षक शैली के लिए जाना जाता है। अक्किथम को सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’, ‘पद्म श्री (2017)’, ‘एझुथचन पुरस्कार’, केंद्र साहित्य अकादमी पुरस्कार, कविता के लिए ‘केरल साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘ओडाकुझल पुरस्कार’ सहित कई अन्य पुरस्कार प्रदान किए गए।

 

कविता संग्रह ‘बालिदर्शनम्’ के लिये उन्हें सन 1973 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2009 में अक्किथम अछूथन नंबूथिरी अपनी मलयालम कृति के लिये ‘मूर्ति देवी पुरस्कार’ से सम्मानित किये गए थे।

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हिन्दी सिनेमा जगत के प्रसिद्ध अभिनेताओं में से एक शशि कपूर का आज जन्‍मदिवस है। अपने सदाबहार अभिनय से लगभग चार दशक तक हिन्दी सिने प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन किया। साल 1965 ई. शशि कपूर के सिने कैरियर का अहम साल साबित हुआ। उसी साल उनकी ‘जब जब फूल खिले’ प्रदर्शित हुई। बेहतरीन गीत, संगीत और अभिनय से सजी इस फ़िल्म की सफलता ने शशि कपूर को स्टार के रूप में स्थापित कर दिया। फ़िल्म को सुपरहिट बनाने में इन गानों ने अह्म भूमिका निभाई थी। साल 1965 मे शशि कपूर के सिने कैरियर की एक और सुपरहिट फ़िल्म ‘वक्त’ रीलीज़ हुई। इन फ़िल्मों की सफलता के बाद शशि कपूर की छवि रोमांटिक हीरो की बन गई

 

शशि कपूर ने लगभग 200 फ़िल्मों में काम किया है। अभिनेता के रूप में ‘जब जब फूल खिले’, ‘आ गले लग जा’, ‘रोटी, कपड़ा और मकान’, ‘शर्मीली’, ‘दीवार’, ‘कभी कभी’, ‘सिलसिला’ aur सत्यंम शिवम सुंदरम’ उनकी प्रमुख फ़िल्में रहीं।’

 

शशि कपूर को फ़िल्मफ़ेयर ‘लाइफ़ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है। 1984 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘न्यू दिल्ली टाइम्स’ के लिए ‘राष्ट्रीय पुरस्कार’ भारत सरकार ने सन 2011 में इनको पद्म भूषण से सम्मानित किया भारत सरकार ने 23 मार्च, 2015 को मशहूर फ़िल्म अभिनेता और निर्माता शशि कपूर को फ़िल्मों में उनके योगदान के लिए दादा साहब फाल्के पुरस्कार देने की घोषणा की।

 

पिता और भाइयों को देखते हुए शशि ने भी अभिनेता बनने की ठानी। उनके पिता पृथ्वीराज कपूर ने शशि को खुद अपना सफर तय करने को कहा।

 

 4) बाल कलाकार कलाकार के रूप में शशि ने आग (1948), आवारा (1951) जैसी कुछ फिल्मों में काम किया। 

 

5) 1961 में धर्मपुत्र से शशि ने अपना करियर शुरू किया। यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित यह फिल्म ‘आचार्य चतुरसेन’ नामक उपन्यास पर आधारित थी। इस फिल्म को 1961 में प्रेसिडेंट सिल्वर मेडल मिला।

 

शशि कपूर को बड़ी सफलता मिली फिल्म ‘जब जब फूल खिले’ (1965) से। मधुर संगीत, रोमांटिक कहानी और शशि कपूर -नंदा की जोड़ी ने सभी का मन मोह लिया। 

 

9) जब जब फूल खिले में अपनी भूमिका की तैयारी के लिए शशि ने कश्मीर में कुछ दिन नाविकों के साथ बिताए ताकि उनकी जीवनशैली से परिचित हो सके। कई बार उनके साथ खाना भी खाया। 

 

17) अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की जोड़ी को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। दीवार, सुहाग, कभी कभी, सिलसिला, नमक हलाल जैसी सफल फिल्में दोनों ने मिलकर दी। 

 

18) कमर्शियल फिल्मों से कमाया पैसा शशि कपूर ने फिल्मों में ही लगाया। उन्होंने पृथ्वी थिएटर स्थापित किया जिसके जरिये कई प्रतिभाएं सामने आईं।

 

 19) शशि कपूर ने सार्थक फिल्में बनाईं। उनके बैनर तले बनी जुनून (1978), कलयुग (1980), 36 चौरंगी लेन (1981), विजेता (1982), उत्सव (1984) आज भी याद की जाती हैं। हालांकि इन फिल्मों के निर्माण में उन्हें तगड़ा घाटा उठाना पड़ा।

 

आज जानीमानी गायिका अलिशा चुनॉए को भी जन्‍म दिन है उन्‍होंने कई फिल्‍मी गीतो में अपनी आवाज दी उनका मेड इन इंडिया एल्‍बम काफी लोकप्रिय हुआ। 

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